डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर शताब्दी अस्पताल में लैब तकनीशियन विवाद: आवेदन के बावजूद रजिस्ट्रेशन पर अड़चन

Updated: 01/02/2026 at 8:10 PM
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर शताब्दी अस्पताल

शताब्दी अस्पताल में लैब तकनीशियन विवाद: आवेदन के बावजूद रजिस्ट्रेशन पर अड़चन

कांदिवली स्थित डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर शताब्दी अस्पताल में बिना पंजीकरण लैब तकनीशियन को लेकर उठा विवाद अब नए मोड़ पर पहुंच गया है। अस्पताल प्रशासन की ओर से स्पष्ट किया गया है कि संबंधित सभी पांच तकनीशियन ने महाराष्ट्र पैरामेडिकल काउंसिल (MPC) में रजिस्ट्रेशन के लिए आवेदन कर दिया है, लेकिन तकनीकी कारणों से अंतिम मंजूरी अटकी हुई है। अस्पताल के मेडिकल अधीक्षक डॉ. अजय गुप्ता के अनुसार, सभी पांचों तकनीशियन ने MPC रजिस्ट्रेशन के लिए ₹2,000 की निर्धारित फीस जमा कर दी है और उन्हें आवेदन की रसीद भी मिल चुकी है। इसके बावजूद रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाई है।

डिग्री मान्यता पर फंसा मामला, DMLT अनिवार्य होने पर जोर

सूत्रों के मुताबिक, रजिस्ट्रेशन में अड़चन की मुख्य वजह यह है कि कुछ तकनीशियन के पास BSc माइक्रोबायोलॉजी की डिग्री है, जबकि कुछ ऐसे संस्थानों से पासआउट हैं जो MPC की मान्यता सूची में शामिल नहीं हैं। इसी कारण काउंसिल स्तर पर उनके आवेदनों पर अंतिम फैसला नहीं लिया जा सका है।

स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और नियमों से जुड़े जानकारों का कहना है कि ब्लड बैंक टेक्नीशियन और लैब टेक्नीशियन के लिए सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त DMLT (डिप्लोमा इन मेडिकल लेबोरेटरी टेक्नोलॉजी) अनिवार्य है। अतीत में इन नियमों को नजरअंदाज कर कई भर्तियां की गईं, जिसका खामियाजा अब कर्मचारियों के साथ-साथ अस्पताल प्रशासन को भी भुगतना पड़ रहा है।

बिना रजिस्ट्रेशन काम करना संज्ञेय अपराध, कानूनी चेतावनी सख्त

इस पूरे मामले पर शिकायतकर्ता अधिवक्ता तुषार भोसले ने सख्त रुख अपनाया है। उनका कहना है कि कानून बिल्कुल स्पष्ट है और लैब तकनीशियन का पंजीकरण अनिवार्य है, चाहे इसके लिए संबंधित कर्मचारियों को अब DMLT कोर्स ही क्यों न करना पड़े।

उन्होंने कहा कि बिना रजिस्ट्रेशन प्रैक्टिस करना संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध की श्रेणी में आता है। महाराष्ट्र स्टेट पैरामेडिकल एक्ट पूरे राज्य में लागू है, जिसमें बीएमसी भी शामिल है। इस कानून को लेकर किसी तरह का भ्रम नहीं होना चाहिए।

अधिवक्ता के अनुसार, MPC ने इस मामले में बीएमसी आयुक्त को अनिवार्य रजिस्ट्रेशन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं, वहीं सेंट्रल मेडिकल सर्विस (CMS) की ओर से भी समर्थन में सर्कुलर जारी किया जा चुका है।

लैब संकट के बीच निजी लैब्स को बढ़ावा? डॉक्टर–लैब गठजोड़ की जांच की मांग

शताब्दी अस्पताल में लैब सेवाओं को लेकर पैदा हुई अनिश्चितता के बीच अब एक नया और गंभीर आरोप सामने आया है। सूत्रों का दावा है कि अस्पताल के भीतर लैब व्यवस्था प्रभावित होने का फायदा उठाकर कुछ निजी डायग्नोस्टिक लैब्स को मरीजों की जांच का काम मिल रहा है, जबकि सरकारी अस्पताल में भर्ती मरीजों की जांच नियमों के अनुसार अस्पताल की अपनी लैब में ही होनी चाहिए। आरोप है कि कुछ मामलों में डॉक्टर मरीजों को बाहर की निजी लैब में ब्लड टेस्ट कराने की सलाह दे रहे हैं, जहां उनसे सरकारी दरों की तुलना में कहीं अधिक शुल्क वसूला जा रहा है। नियमों के मुताबिक, बाहर की लैब तभी लिखी जा सकती है जब अस्पताल में संबंधित जांच उपलब्ध न हो या तकनीकी कारणों से संभव न हो, वह भी लिखित कारण और मरीज की सहमति के साथ। इस पूरे मामले में शिकायतकर्ता अधिवक्ता तुषार भोसले ने कहा कि बिना वैध कारण सरकारी अस्पताल के मरीज को निजी लैब भेजना नियमों का उल्लंघन हो सकता है। यदि डॉक्टर और निजी लैब के बीच सांठगांठ साबित होती है, तो यह पेशेवर कदाचार और भ्रष्टाचार की श्रेणी में आएगा। स्वास्थ्य विभाग के जानकारों का कहना है कि पहले तकनीशियन पंजीकरण विवाद, फिर अंदर की लैब सेवाओं में बाधा और अब बाहर की निजी लैब्स की सक्रियता — ये सभी बिंदु मिलकर Doctor–Lab Nexus की आशंका को मजबूत करते हैं। इस पर नगर निगम के सतर्कता विभाग और मेडिकल काउंसिल से जांच की मांग उठने लगी है।

डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर शताब्दी अस्पताल
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर शताब्दी अस्पताल

बाहर की निजी लैब में जांच लिखना नियमों के खिलाफ

नियमों के अनुसार, यदि सरकारी अस्पताल में जांच सुविधा उपलब्ध है, तो मरीज को बाहर की निजी लैब भेजना नियमों का उल्लंघन माना जाता है। केवल मशीन खराब होने, जांच उपलब्ध न होने या आपात स्थिति में ही बाहर की लैब लिखी जा सकती है, वह भी लिखित कारण और मरीज की सहमति के साथ।

इसके बावजूद, शताब्दी अस्पताल के बाहर मौजूद कई निजी लैब्स द्वारा सरकारी मरीजों की जांच किए जाने और उनसे अधिक शुल्क वसूले जाने की शिकायतें सामने आ रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति मरीजों पर आर्थिक बोझ डालने के साथ-साथ अस्पताल प्रशासन की जवाबदेही पर भी सवाल खड़े करती है।

मरीज सबसे ज्यादा प्रभावित

सरकारी अस्पताल में इलाज कराने वाले अधिकांश मरीज आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से आते हैं। ऐसे में निजी लैब्स के महंगे टेस्ट उनके लिए भारी बोझ बन जाते हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति न केवल आर्थिक शोषण की ओर इशारा करती है, बल्कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े करती है।

प्रशासन से सवाल ?

शताब्दी अस्पताल का मौजूदा मामला केवल लैब तकनीशियन रजिस्ट्रेशन तक सीमित नहीं रह गया है। यह अब इस बात की जांच की मांग कर रहा है कि:

  • क्या अस्पताल की अंदरूनी अव्यवस्था जानबूझकर बनी रहने दी गई?

  • क्या निजी लैब्स को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा दिया गया?

  • और क्या मरीजों की मजबूरी को मुनाफे का जरिया बनाया गया?

इन सवालों के जवाब अब नगर निगम, स्वास्थ्य विभाग और जांच एजेंसियों को देने होंगे।

शताब्दी अस्पताल मामले में ACB/Vigilance जांच की मांग

मुंबई के कांदिवली स्थित डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर शताब्दी अस्पताल में लैब तकनीशियन रजिस्ट्रेशन विवाद के बीच अब डॉक्टर–निजी लैब गठजोड़ की आशंका को लेकर ACB और सतर्कता विभाग से जांच की मांग की गई है।

First Published on: 01/02/2026 at 8:10 PM
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