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Monday, June 14, 2021

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मानव है या हैवान

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मानव है या हैवान

  वर्तमान दौर को देखा जाए तो मानव पर हैवान शब्द की सार्थकता प्रतीत होती है “आज मानव मानव नहीं रहा बल्कि पर काया प्रवेश कर हैवान बन चुका है” वर्तमान परिस्थितियाँ इस कथन को सार्थक सिद्ध करती है।भारत वर्ष में मानव ने हैवानियत की सारी हदें पार कर दी है जिसमें लूट,बलात्कार,प्रताड़ना शामिल है।हम आए दिन अखबारों,टीवियों में यही देखते है लड़की का अपहरण कर रेप किया गया बाद में उसकी हत्या कर दी गयी।देश के लगभग हर कोने में ये घटनाएं आम हो गयी।एक मामला शांत होता नहीं कि दुसरा मामला भी हो जाता है।
हैवानियत इतनी बढ़ रही है कि इंसान दूसरे इंसान से नफ़रत करने लगा है।ना कोई नारी खुले में कहीं आ जा सकती है और ना ही सुरक्षित हैं।
वर्तमान समय में पुराने दौर को नकारा जाता है लेकिन अगर देखा जाए तो वह दौर स्त्रियों के लिए इस दौर से कहीं अधिक बेहतर था।उस दौर में महिलाएँ यदि आधी रात को भी गहने पहनकर निकल जाए तो भी कोई इतनी चिंता नहीं होती थी।उस दौर में महिलाओं को शिक्षा से लेकर विवाह तक की छुट भले कम थी परन्तु मध्यकालीन युग के पश्चात धीरे धीरे परिस्थितियां बदलती गयी और वर्तमान दौर ऐसा है कि दोपहर में भी लड़कियों का अकेले घर से बाहर निकलना बेहद मुश्किल है।
समाज में स्त्री के अनेक दायरे बनाए गए है।पुरुषों के लिए कोई भी दायरा नहीं है।यदि देखा जाए तो देश में नारी सशक्तिकरण की बात होती रही है लेकिन क्या महिलाएं सुरक्षित है?जवाब हां भी होगा और ना भी होगा।हकीकत में महिलाएं सुरक्षित नहीं है और उसकी वजह है लोगों में बढ़ती हैवानियत।मानव या हैवान यह तय हो जाता है जब कोई हैवानी की हदें पार करता है।बड़ी विडम्बना ये भी है कि हैवानों के हौसले दिनों दिन बुलन्द होते जा रहे है पर अफसोस कि अभी तक दरिंदगी कम नहीं हुई बल्कि हर दिन एक न एक मामला हैवानों द्वारा किया जाता है।
मानव को हैवान या दानव कहना तब उचित हो जाता है जब वह किसी की बहन,बेटी,माँ के साथ बदसलूकी करता है।उसे हैवान कहना सर्वथा उचित है।
मानव वो है जो ‘सर्वजन सुखाय सर्वजन हिताय’ की भावना रखता है।जब कोई किसी महिला के साथ हैवानी करता है बदसलूकी करता है तब वो तो हैवान है ही और जब उसके पास खड़ा कोई मानव जो यह दृश्य देख रहा होता है और गंदी करतूत का विरोध नहीं करता तब उसे भी हैवान की श्रेणी में रखा जाता है।
जब तक हैवानों के पंख काटे नहीं जाएंगे तब तक उनके हौसले बुलन्द रहेंगे।वर्तमान दौर को देख ही रहे है हम पर पता लग ही रहा है कौन हैवान है और कौन मानव।देश में हैवान बढ़ रहे और मानवता खत्म हो रही।इंसानियत शर्मसार है।मानव मानव को काटने दौड़ता है।नारी शक्ति में भय व्याप्त है।पहले रात को नारी इसलिए बाहर नहीं निकलती थी क्योंकि जानवर का डर था अब तो रात तो दूर की बात है दिन में भी इंसान रूपी जानवर से डर लगता है।इससे बड़ी विडम्बना क्या हो सकती है।
आजकल इस प्रकार की घटनाओं को सुनकर अखबार पढ़ने का दौर भी थम गया है।ऐसा एक भी दिन नहीं जाता कि किसी महिला का यौन शोषण न हुआ हो।हर दिन अखबार में एक न एक समाचार तो इसी का छपा होता है।
अगर महिलाओं के खिलाफ इसी तरह से अत्याचारों में बढ़ोतरी होती गई तो आने वाले समय में इंसानियत कम हैवानों की संख्या अधिक होगी।कहीं कहीं पर अगर देखा जाए तो प्रशासन भी आँख मिचोली कर रहा है।पीड़ितों का पक्ष लेने से भी कतराते है और आरोपियों के पक्ष में रहते है क्योंकि उन्हें रिश्वत दी जाती है।आखिर कब तक इस पुरुष प्रधान देश में नारी पर अत्याचार होता रहेगा? क्यों पुरुषों में संकीर्ण सोच कूट कूट के भरी हुई है।इतनी हैवानियत आखिर क्यों?
वर्तमान समय में अपनी बहन बेटियों को फूल सी नाजुक न बनाएं बल्कि फूलन देवी सी कठोर निर्णय लेने वाली बनाएं जो स्वयं अपनी रक्षा के लिए अपराधियों को सरे आम गोलियों से भून डाला था।अब समय आ गया है नारी को कोई सशक्त नहीं बनाएगा बल्कि उसे खुद सशक्त बनना पड़ेगा और जुल्म के खिलाफ लड़ना होगा।
समय रहते सरकार को भी जो नियम व कानून बनाए गए है उनका सख्ती से पालन करना होगा क्योंकि जब तक सरकार यौन हिंसा के खिलाफ सख्ती नहीं बरतेगी तब तक हैवानों की करतूतें नहीं थमेगी। अमीर घराने के लोग कानून को भी अपने हाथ में रखते हैं इस प्रकार के व्यंग्य करते है कि पीड़ित महिलाएं आवाज उठाने से भी डरती है। इस प्रकार के लोगों के खिलाफ कड़ी सजा का प्रावधान जरूरी है।

अरविन्द कालमा गाँव/पोस्ट - भादरूणा, तहसील- साँचोर (राजस्थान)

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अरविन्द कालमा
साँचोर, राजस्थान

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