
Mumbai Footpath Rights : हॉकर्स की आजीविका और जनता के अधिकार के बीच संतुलन का सवाल
बात निकली तो दूर तक जाएगी …
(दिनेश वर्मा, मुंबई, भारत)
मुंबई को अक्सर “कभी न रुकने वाला शहर” कहा जाता है। यहाँ सुबह से रात तक लाखों लोग काम पर जाते हैं, बाजारों में खरीदारी करते हैं और सड़कों व फुटपाथों से होकर अपने गंतव्य तक पहुँचते हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में मुंबई के सार्वजनिक स्थानों-विशेषकर फुटपाथों-को लेकर एक बड़ा सवाल बार-बार उठता रहा है: क्या ये फुटपाथ पैदल चलने वालों के लिए हैं या व्यापार के लिए?
शहर की सच्चाई यह है कि फुटपाथों पर बड़ी संख्या में स्ट्रीट वेंडर्स या हॉकर्स अपना व्यवसाय करते हैं। फल-सब्ज़ी बेचने वाले, चाय-नाश्ते के ठेले, कपड़ों के स्टॉल और छोटी दुकानों के रूप में यह पूरा अनौपचारिक बाजार मुंबई की रोज़मर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। यह व्यवस्था लाखों लोगों की रोज़ी-रोटी का आधार है। लेकिन दूसरी तरफ़ यह भी सच है कि जब फुटपाथ पूरी तरह इन गतिविधियों से भर जाते हैं, तो पैदल चलने वाले नागरिकों को सड़क पर उतरना पड़ता है, जिससे दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है।
यही वह स्थिति है जिसने “आजीविका बनाम सार्वजनिक अधिकार” की बहस को जन्म दिया है। सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि इस विषय में कानून क्या कहता है। भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को व्यवसाय करने की स्वतंत्रता देता है। संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत कोई भी व्यक्ति वैध व्यापार या पेशा चुन सकता है। इसी आधार पर अदालतों ने कई मामलों में यह माना है कि स्ट्रीट वेंडिंग पूरी तरह अवैध गतिविधि नहीं है। लेकिन यह अधिकार पूर्ण नहीं है। संविधान यह भी स्पष्ट करता है कि सार्वजनिक हित में इस अधिकार को सीमित किया जा सकता है। सड़कें और फुटपाथ सार्वजनिक उपयोग के लिए बनाए जाते हैं और उनका प्राथमिक उद्देश्य पैदल यात्रियों और यातायात को सुरक्षित मार्ग उपलब्ध कराना है। इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट का एक ऐतिहासिक फैसला 1985 में आया था, जब *Bombay Hawkers Union बनाम बृहन्मुंबई महानगरपालिका* मामले में अदालत ने कहा कि हॉकर्स को पूरी तरह प्रतिबंधित करना उचित नहीं होगा, क्योंकि इससे लाखों लोगों की आजीविका प्रभावित हो सकती है। लेकिन साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सड़कें और फुटपाथ स्थायी बाजार नहीं बन सकते।
इसके बाद 1989 में Sodan Singh बनाम NDMC मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने यही सिद्धांत दोहराया कि फुटपाथ पर व्यापार करना मौलिक अधिकार का हिस्सा हो सकता है, लेकिन यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था और यातायात के हित में नियंत्रित किया जा सकता है। इन्हीं सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने वर्ष 2014 में Street Vendors (Protection of Livelihood and Regulation of Street Vending) Act लागू किया। इस कानून का उद्देश्य दो महत्वपूर्ण बातों के बीच संतुलन बनाना था-एक तरफ़ हॉकर्स की आजीविका की सुरक्षा और दूसरी तरफ़ शहरों में सार्वजनिक स्थानों की व्यवस्था बनाए रखना। इस कानून के तहत प्रत्येक शहर में Town Vending Committee (TVC) बनाने का प्रावधान किया गया। इस समिति में नगर निगम के अधिकारी, पुलिस प्रतिनिधि, स्थानीय नागरिक और हॉकर्स के प्रतिनिधि शामिल होते हैं। समिति का काम यह तय करना होता है कि शहर में कहाँ हॉकिंग की अनुमति होगी और कहाँ नहीं। साथ ही हॉकर्स का सर्वे करके उन्हें लाइसेंस देना भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा है।
मुंबई में भी इसी कानून के आधार पर हॉकर्स को व्यवस्थित करने की कोशिश की गई। बृहन्मुंबई महानगरपालिका ने एक सर्वे के बाद शहर की लगभग 1366 सड़कों को संभावित हॉकिंग ज़ोन के रूप में चिन्हित किया था। इन स्थानों पर हजारों हॉकिंग पिच प्रस्तावित किए गए, जहाँ लाइसेंस प्राप्त विक्रेता व्यापार कर सकते हैं। इसके अलावा शहर के कुछ प्रमुख क्षेत्रों को Hawker-Free Zones घोषित किया गया है। मरीन ड्राइव, नरिमन पॉइंट, फ्लोरा फाउंटेन, गेटवे ऑफ इंडिया और बांद्रा बैंडस्टैंड जैसे स्थानों पर फुटपाथों को पूरी तरह पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित रखने की नीति अपनाई गई है।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी समय-समय पर इस विषय पर सख्त टिप्पणियाँ की हैं। अदालत ने स्पष्ट कहा है कि यदि फुटपाथों पर अतिक्रमण के कारण नागरिकों को सड़क पर चलने के लिए मजबूर होना पड़ता है, तो यह प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह कानून का पालन सुनिश्चित करे। अदालत ने यह भी दोहराया है कि सार्वजनिक स्थानों का उपयोग इस प्रकार होना चाहिए कि आम नागरिकों का अधिकार सुरक्षित रहे। फिर भी वास्तविकता यह है कि कानून बनने के बावजूद व्यवस्था पूरी तरह लागू नहीं हो पाई है। इसके पीछे कई कारण हैं। कई वर्षों तक टाउन वेंडिंग कमेटी पूरी तरह सक्रिय नहीं हो सकी, हॉकर्स की वास्तविक संख्या को लेकर विवाद बना रहा और कई मामलों में राजनीतिक हस्तक्षेप भी प्रशासनिक कार्रवाई को प्रभावित करता रहा। विशेषज्ञ मानते हैं कि समस्या का समाधान केवल अतिक्रमण हटाने में नहीं है, बल्कि एक पारदर्शी और आधुनिक व्यवस्था बनाने में है। यदि सभी हॉकर्स का डिजिटल पंजीकरण किया जाए और उन्हें पहचान आधारित लाइसेंस दिए जाएँ, तो यह स्पष्ट हो सकेगा कि कौन व्यक्ति अधिकृत है और कौन नहीं। इससे अवैध गतिविधियों को नियंत्रित करना आसान होगा। इसके साथ ही कई शहरी योजनाकार यह सुझाव भी देते हैं कि शहर में निर्धारित स्थानों पर समयबद्ध स्ट्रीट मार्केट विकसित किए जा सकते हैं। उदाहरण के लिए कुछ क्षेत्रों में शाम के समय अस्थायी बाजार लगाने की अनुमति दी जा सकती है, जबकि दिन के समय वही स्थान पैदल यात्रियों और यातायात के लिए खुला रखा जा सकता है। इस प्रकार की व्यवस्था से शहर की आर्थिक गतिविधि भी बनी रहती है और सार्वजनिक स्थानों पर दबाव भी कम होता है।
दुनिया के कई शहरों ने इस दिशा में सफल प्रयोग किए हैं। सिंगापुर ने स्ट्रीट वेंडर्स को व्यवस्थित हॉकर सेंटर्स में स्थानांतरित करके उन्हें स्वच्छ और नियंत्रित वातावरण में व्यापार करने का अवसर दिया। बैंकॉक में कुछ क्षेत्रों में समयबद्ध स्ट्रीट वेंडिंग की अनुमति दी जाती है। न्यूयॉर्क में सीमित लाइसेंस प्रणाली लागू है, जिसके तहत केवल निर्धारित संख्या में ही स्ट्रीट वेंडर्स को अनुमति मिलती है।
मुंबई जैसे महानगर में यह स्वीकार करना होगा कि स्ट्रीट वेंडिंग को पूरी तरह समाप्त करना संभव नहीं है। यह शहर की अर्थव्यवस्था और संस्कृति का हिस्सा है। लेकिन यह भी उतना ही जरूरी है कि फुटपाथ पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित और खुला रहे।मुंबई में हॉकर्स का मुद्दा केवल कानून का नहीं बल्कि शहरी सामाजिक-आर्थिक संतुलन का प्रश्न है। एक ओर लाखों लोगों की रोज़ी-रोटी स्ट्रीट वेंडिंग पर निर्भर है, वहीं दूसरी ओर करोड़ों नागरिकों को सुरक्षित फुटपाथ और सड़कें चाहिए।
इसलिए सुप्रीम कोर्ट, बॉम्बे हाईकोर्ट और सरकारों ने बार-बार यह सिद्धांत दोहराया है:
“Livelihood of vendors must be protected, but public streets and footpaths cannot be encroached permanently.”