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Monday, June 14, 2021

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सिद्धार्थ से भगवान बुद्ध बनने की यात्रा

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सिद्धार्थ से भगवान बुद्ध बनने की यात्रा

वैशाख पूर्णिमा के दिन आज से लगभग 563 ई. पूर्व बौद्ध धर्म के संस्थापक भगवान बुद्ध का जन्म कपिलवस्तु के राजा शुद्धोधन के यहाँ लुम्बिनी वन में हुआ था, जो नेपाल में है। बालक के जन्म के सात दिन बाद ही उनकी माँ, महारानी महामाया देवी का देहांत हो गया था। उनका पालन पोषण उनकी मौसी और शुद्धोधन की दूसरी रानी महाप्रजवाती (गौतमी) ने किया था। बालक का नाम सिद्धार्थ रखा गया, जिसका अर्थ है ‘वह जो सिद्धि प्राप्ति के लिए जन्मा हो’।
महात्मा बुद्ध को भगवान विष्णु का नौवाँ अवतार कहा जाता है। इनका बचपन का नाम सिद्धार्थ था और गोत्र गौतम। बौद्ध ग्रन्थों के अनुसार गौतम बुद्ध के जन्म के 12 वर्ष पूर्व ही एक ऋषि ने भविष्यवाणी की थी यह बालक छोटी आयु में ही महान ऋषि बनेगा। उनके मन में शुरू से ही करुणा भरी हुई थी। इसका परिचय उनके आरंभिक जीवन की अनेक घटनाओं से पता चलता है। घुड़दौड़ में जब घोड़े दौड़ते और उनके मुंह से झाग निकलने लगता तो सिद्धार्थ उन्हे थका हुआ जानकर उन्हे वहीं रोक देते और जीती हुई बाज़ी हार जाते। खेल में भी उन्हे खुद का हार जाना पसंद था क्योंकि किसी को हराना और किसी का दुखी होना उनसे देखा नहीं जाता था। 35 वर्ष की आयु में उन्हे ज्ञान की प्राप्ति हो गयी थी।
शिक्षा एवं विवाह :
सिद्धार्थ ने गुरु विश्वामित्र से शिक्षा प्राप्त की। कुश्ती, घुड़दौड़, तीर-कमान, रथ हाँकने में कोई उसकी बराबरी नहीं कर पाता। 16 वर्ष की आयु में उनकी शादी राजकुमारी यशोधरा से हुई, जिनसे उनका एक पुत्र राहुल पैदा हुआ।
दृश्य जिसने बदल दिया जीवन :
21 वर्ष की आयु में सिद्धार्थ एक दिन अपने राज्य में भ्रमण के लिए निकले। तब उनकी दृष्टि चार दृश्यों पर पड़ी। ये दृश्य थे, एक वृद्ध  व्यक्ति, एक रोगी, एक पार्थिव शरीर और एक साधु। इन चार दृश्यों को देख कर सिद्धार्थ समझ गए कि सबका जन्म होता है, सबको बुढ़ापा आता है, सबको बीमारी होती है, और एक दिन, सब मृत्यु को प्राप्त होते हैं। इससे व्यथित होकर उन्होने अपना राज पाठ, पत्नी, पुत्र का त्याग करते हुए साधु जीवन को अपना लिया और सत्य कि खोज में निकल गए।
सिद्धार्थ से भगवान बुद्ध
ज्ञान की प्राप्ति :
गृह त्याग के बाद उन्होने सात दिन ‘अनुपीय’ नामक ग्राम में बिताए।वहाँ उन्होने भिक्षा मांगी। फिर गुरु कि खोज में वह मगध कि राजधानी पहुंचे, जहां कुछ दिनों तक वह ‘आलार कालाम’ तपस्वी और उद्दक रामपुत्र के साथ भी रहे। उनसे योग साधना सीखी। समाधि लगाना सीखा। लेकिन उन्हे संतोष नहीं मिला। अंत में ज्ञान कि प्राप्ति के लिए उन्होने स्वयं ही तपस्या शुरू कर दी। कठोर तप से उनकी काया जर्जर हो गयी थी लेकिन उन्हे अभी तक ज्ञान कि प्राप्ति नहीं हुई थी। घूमते घूमते वह एक दिन गया में उरुवेला के निकट निरंजना नदी के तट पर पहुंचे और वहाँ एक पीपल के वृक्ष के नीचे स्थिर भाव में बैठ कर समाधिस्थ हो गए।
इसे बौद्ध साहित्य में ‘संबोधि काल’ कहा गया है। छः वर्षों तक समाधिस्थ रहने के बाद जब उनकी आँख खुली और उन्हे ज्ञान कि प्राप्ति हुई, वह वैशाख पूर्णिमा का दिन था और वह महात्मा बुद्ध कहलाए। उस स्थान को ‘बौद्ध गया’ व पीपल के पेड़ को ‘बोधि वृक्ष’ कहा जाता है।
धर्म-चक्र-प्रवर्तन :
वे 80 वर्ष की उम्र तक अपने धर्म का संस्कृत के बजाय उस समय की सीधी सरल लोकभाषा पाली में प्रचार करते रहे। उनके सीधे सरल धर्म की लोकप्रियता तेजी से बढ़ने लगी। चार सप्ताह तक बोधिवृक्ष के नीचे रहकर धर्म के स्वरूप का चिंतन करने के बाद बुद्ध धर्म का उपदेश करने निकल पड़े। आषाढ़ की पूर्णिमा को वे काशी के पास मृगदाव (वर्तमान में सारनाथ) पहुँचे। वहीं पर उन्होंने सर्वप्रथम धर्मोपदेश दिया और प्रथम पाँच मित्रों को अपना अनुयायी बनाया और फिर उन्हें धर्म प्रचार करने के लिये भेज दिया। महाप्रजापती गौतमी (बुद्ध की विमाता) को सर्वप्रथम बौद्ध संघ मे प्रवेश मिला। आनंद,बुद्ध का प्रिय शिष्य था। बुद्ध आनंद को ही संबोधित करके अपने उपदेश देते थे।
सिद्धार्थ से भगवान बुद्ध
महापरिनिर्वाण:
पालि सिद्धांत के महापरिनिर्वाण सुत्त के अनुसार ८० वर्ष की आयु में बुद्ध ने घोषणा की कि वे जल्द ही परिनिर्वाण के लिए रवाना होंगे। बुद्ध ने अपना आखिरी भोजन, जिसे उन्होंने कुन्डा नामक एक लोहार से एक भेंट के रूप में प्राप्त किया था, ग्रहण लिया जिसके कारण वे गंभीर रूप से बीमार पड़ गये। बुद्ध ने अपने शिष्य आनंद को निर्देश दिया कि वह कुन्डा को समझाए कि उसने कोई गलती नहीं की है। उन्होने कहा कि यह भोजन अतुल्य है।
उपदेश:
भगवान बुद्ध ने लोगों को मध्यम मार्ग का उपदेश किया। उन्होंने दुःख, उसके कारण और निवारण के लिए अष्टांगिक मार्ग सुझाया। उन्होंने अहिंसा पर बहुत जोर दिया है। उन्होंने यज्ञ और पशु-बलि की निंदा की।बुद्ध के उपदेशों का सार इस प्रकार है –

महात्मा बुद्ध ने सनातन धर्म के कुछ संकल्पनाओं का प्रचार किया, जैसे अग्निहोत्र तथा गायत्री मन्त्र

ध्यान तथा अन्तर्दृष्टि

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मध्यमार्ग का अनुसरण

चार आर्य सत्य

अष्टांग मार्ग

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बौद्ध धर्म एवं संघ:
बुद्ध के धर्म प्रचार से भिक्षुओं की संख्या बढ़ने लगी। बड़े-बड़े राजा-महाराजा भी उनके शिष्य बनने लगे। भिक्षुओं की संख्या बहुत बढ़ने पर बौद्ध संघ की स्थापना की गई। बाद में लोगों के आग्रह पर बुद्ध ने स्त्रियों को भी संघ में ले लेने के लिए अनुमति दे दी, यद्यपि इसे उन्होंने उतना अच्छा नहीं माना। भगवान बुद्ध ने ‘बहुजन हिताय’ लोककल्याण के लिए अपने धर्म का देश-विदेश में प्रचार करने के लिए भिक्षुओं को इधर-उधर भेजा। अशोक आदि सम्राटों ने भी विदेशों में बौद्ध धर्म के प्रचार में अपनी अहम्‌ भूमिका निभाई। मौर्यकाल तक आते-आते भारत से निकलकर बौद्ध धर्म चीन, जापान, कोरिया, मंगोलिया, बर्मा, थाईलैंड, हिंद चीन, श्रीलंका आदि में फैल चुका था। इन देशों में बौद्ध धर्म बहुसंख्यक धर्म है।
श्रीमती रिया अग्रवाल
फरीदाबाद, हरियाणा

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