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AIBEA अखिल भारतीय बैंक कर्मचारी संघ ने जुलाई माह में बैंकों के राष्ट्रीयकरण की 52 वीं वर्षगांठ के अवसर पर व्याख्यान श्रंखला का आयोजन किया गया

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बैंकिंग जागरूकता का उद्देश्य सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को आम जनता और सामान्य खाताधारकों द्वारा व्यापार जगत के असीमित प्रभाव से बचाना है 

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इसका उद्देश्य आम जमाकर्ताओं को बैंक के निजीकरण के संभावित खतरों से अवगत कराना है .

रिपोर्ट : के . रवि ( दादा ) ,,

अखिल भारतीय बैंक कर्मचारी संघ द्वारा आयोजित वेबिनार श्रृंखला में यह दूसरा व्याख्यान था . जो डॉक्टर . प्रो के नागेश्वर के मार्गदर्शन में किया गया था . डॉक्टर . प्रो के नागेश्वर पत्रकारिता विभाग, उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद में पढ़ाते है . वह आंध्र प्रदेश विधान परिषद के सदस्य भी रहे हैं .
बैंकिंग क्षेत्र की भाषा में शब्दों और आम आदमी की समझ बढ़ाने के लिए मौलिक मार्गदर्शन भी प्रो के नागेश्वर ने किए . उन्होंने आज के व्याख्यान में रेखांकित किया कि कैसे सार्वजनिक संवाद में शब्दों का चुनाव हमारे बैंकिंग क्षेत्र को देखने के तरीके को मौलिक रूप से बदल देता है .
डॉक्टर . प्रो के नागेश्वर ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को पर होनेवाली प्रमुख आपत्तियां की टिपण्णी की . यह पहला आरोप रहता है कि ये बैंक अक्षम रहती हैं . अक्सर यह कहा जाता है कि बैंकों के समग्र कवरेज और संरचनात्मक निवेश का प्रबंधन एक सफेद हाथी के खिलाने जैसा है . यह धारणा कि यह एक पुरानी व्यवस्था है, उदारीकरण की दर से बनाई गई है . ऐसा कई लोगो का कहना होता है .

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राष्ट्रीयकृत बैंकों की जनशक्ति और कार्य संस्कृति भी अद्यतित नहीं है . ऐसे कई आरोप दोहराए जाते हैं। इसमें प्रो के नागेश्वर इन आपत्तियों को उठाते हुए उन्होंने सवाल उठाया कि क्यों कोई बैंक भर्ती प्रक्रिया में मंदी और बढ़ती आबादी के अनुपात में इसे चौड़ा करने की बात नहीं कर रहा है .

AIBEA

आम आदमी न केवल भारत में बल्कि दुनिया में अर्थव्यवस्था की रीढ़ है . यह निजी बैंक आम आदमी के लिए हैं या अमीरों के लिए ? इस पर भी विचार किया जाना चाहिए . उन्होंने जोर देकर कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की कमियों को दूर करने के लिए काम किया जाना चाहिए ऐसा मत प्रो के नागेश्वर का हैं .

एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि निजी बैंकिंग उद्योग लाभदायक हैं . इसलिए यह भ्रांति खुलेआम फैली हुई है कि यह सार्वजनिक बैंकों में उपलब्ध नहीं है . लाभ वास्तव में क्या है? इस प्रश्न का उत्तर खोजना होगा . भारत में सभी कल्याणकारी योजनाओं के लिए पैसा केवल सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से आता है . निजी बैंक कल्याणकारी योजनाओं के भुगतान का उदाहरण नहीं हैं . फिर यह स्वीकार करना होगा कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक जमा स्तर पर मजबूत और कुशल हैं . राजनीतिक उद्देश्यों के लिए सार्वजनिक बैंकिंग प्रणाली का दुरुपयोग किया जा रहा है या नहीं, इस पर चर्चा करने के बजाय, हम यह भ्रम पैदा कर रहे हैं कि बैंक स्वयं लाभ नहीं दे रहे हैं .

आगे प्रो के नागेश्वर ने यह भी कहा कि यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि डूबे हुए निजी बैंकों की संख्या अधिक है .

अगर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को चलाना है, तो तस्वीर यह है कि परिचालन घाटा बहुत बड़ा है . यदि हम सब्सिडी और प्रोत्साहन की दो शर्तों में जाते हैं, तो हम इस तथ्य को समझ सकते हैं कि परिचालन नुकसान बैंकों द्वारा किए जाने वाले दैनिक खर्च हैं , यह भारत के लिए महत्वपूर्ण है .

कर्ज माफी शब्द का प्रयोग तब किया जाता है जब आम आदमी कर्ज लेता है और उसे माफ किया जाता है . लेकिन अगर इसे बड़े औद्योगिक समूहों ने अपने कब्जे में ले लिया और डूब गया, तो यह गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों के लिए एक सरल शब्द है .
इसे संपत्ति क्यों कहा जाता है जिससे देश और बैंकों को कुछ नहीं मिलता है? प्रो के नागेश्वर का मत हैं कि राजनीतिक नेताओं और अर्थशास्त्रियों को भी जवाब देना चाहिए कि वे किस अर्थ में इसे संपत्ति कहते हैं . एनपीए को डिफॉल्टर क्यों नहीं कहां जाता ? हालांकि राइट ऑफ कॉर्पोरेट शब्द भी पुनर्गठन विनम्र लग सकता हो तो भी , आखिर में वास्तविकता यह है कि यह एक परिचालन नुकसान भी है . लेकिन चूंकि यह बड़े व्यवसाय के कारण होता है, इसलिए इसे बट्टे खाते में डालने और कॉर्पोरेट पुनर्गठन जैसे शब्द देकर राजनीतिक शरण दी जाती है . साधारण जमाकर्ताओं को इस बात को समझना चाहिए कि आज देश में बैंक कर्ज माफी के कारण नहीं बल्कि एनपीए के कारण डूब रहे हैं .

अर्थशास्त्र के बड़े बड़े शब्दों का प्रयोग कर सार्वजनिक क्षेत्र के बारे में जनता को गुमराह करने में आम आदमी की भूमिका पर समय रहते अंकुश लगाया जाना चाहिए, प्रो के नागेश्वर ने आगे कहां की शब्दों के जाल में फंसकर आम खाताधारकों को आर्थिक रूप से तंग किया जा रहा है.

वेबिनार में भारत भर के हजारों बैंक कर्मचारियों, अर्थशास्त्रियों के साथ-साथ सार्वजनिक क्षेत्र को मजबूत करने का समर्थन करने वाले नागरिकों ने भी भाग लिया . एआईबीईए के अध्यक्ष कामरेड नंदकुमार चव्हाण और महासचिव देवीदास तुलजापुरकर ने अधिक से अधिक लोगों से इस महीने लंबी व्याख्यान श्रृंखला का लाभ उठाने की अपील की थी , जिसे लोगो ने काफी पसंद किया .

एआईबीईए के बारे में

गौरतलब हो कि अखिल भारतीय बैंक कर्मचारी संघ, भारत में बैंक कर्मचारियों का सबसे पुराना और सबसे बड़ा राष्ट्रीय ट्रेड यूनियन केंद्र है, जिसकी स्थापना 1946 में 20 अप्रैल को कोलकाता में हुई थी . एआईबीईए बैंक यूनियनों द्वारा किए गए प्रयासों के माध्यम से प्रबंधन द्वारा मान्यता प्राप्त की गई और प्रत्येक बैंक में आपसी समझौतों द्वारा भर्ती, स्थानान्तरण और पदोन्नति पर कई नीतिगत मुद्दों को नियंत्रित किया गया . वेतन और सेवा शर्तों में सुधार के लिए संघर्ष के साथ-साथ, एआईबीईए ने बैंकों के राष्ट्रीयकरण के लिए भी अभियान चलाया . वर्षों के निरंतर प्रयासों और संघर्ष के बाद, एआईबीईए ने अपना उद्देश्य हासिल किया जब जुलाई, 1969 में प्रमुख 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया . इसके बाद 1980 में 6 बैंकों के एक और समूह का राष्ट्रीयकरण किया गया . एआईबीईए हमेशा अपनी दोहरी नीतियों द्वारा शासित रहा है – बैंकिंग उद्योग की प्रगति के लिए चिंता और बैंकिंग कर्मचारियों के हितों की बेहतरी के लिए चिंतामय रहा हैं . आज भी एआईबीईए इन्हीं सिद्धांतों से संचालित होता है .

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