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पैर न होने पर जज्बा नहीं हुआ कम, घर पर ही जमा लिया छाता का व्यवसाय

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किसी ने बहुत ही खुबसूरत बात कही है, “बिना संघर्ष के कोई महान नहीं बनता, पत्थर पर जब तक चोट ना पड़े, तब तक पत्थर भी भगवान नहीं बनता है।” सफलता प्राप्त करने के रास्तों में बहुत सारी चुनौतियां आती है, लेकिन उन चुनौतियों से बिना हार माने जो उसका सामना करता है, वही अपने लक्ष्य तक पहुंचता है।

आज की हमारी कहानी केरल कोझीकोड के पेरम्बरा में एक छाता निर्माता, हारिस की बारे मे है | जो पिछले 23 वर्ष पहले एक दुर्घटना के शिकार हो गए थे और बाद मे बिस्तर पर पड़ गए |पिछले COVID19 महामारी के कारण कठिनाई का सामना करना पड़ रहा था । हादसे के बाद उनके जीवन मे कठिनाई बढ़ने लगी तब उन्होंने घर पर ही छाता बना कर बेचने लगे |लेकिन दुबारा कोविड की वजह से उनका धंदा मंदा पड़ गया था ऐसे मे उनको एक संगठन के स्वयंसेवक ने सम्पर्क किया और उन्हें व्हाट्सएप के जरिए ऑर्डर दिलाने में मदद किया। फलस्वरूप आज वो अच्छी अमंदनी कर लेते है|हारिस कहते हैं, “दुर्घटना 23 साल पहले हुई थी। मैंने छाता बनाना बाद में सीखा। अब 10 साल हो गए हैं मुझे इस व्यवसाय मे जुड़े । कोरोना के समय में, मैं हमेशा की तरह नहीं बेच सकता था। अब इसे कुछ व्हाट्सएप ग्रुप के माध्यम से बेचा लेता हू। नया लाइफ चैरिटेबल ट्रस्ट ने इसमें मदद की। यह मेरी एकमात्र आय है।”

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पैर न होने पर जज्बा नहीं हुआ कम, घर पर ही जमा लिया छाता का व्यवसाय

हरीश का यह जुनून केवल औरो के लिए एक प्रेणा नहीं , बल्कि उनके अटूट विश्वास की दास्तां भी है, जिसके दम पर उन्होंने निराशा के हाथों मजबूर होने के बजाए बड़ी बाधाओं को पार कर अपनी सबसे बड़ी कमजोरी को सबसे बड़ी ताकत बनाने की हिम्मत दिखाई.

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