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कब्जाधारकों, अतिक्रमणकारियों को छोड़ बाकी को निशुल्क हस्तांतरण हो भूमि:-ओंकार सिंह

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अम्बाला छावनी फ्रीहोल्ड करने की नीति स्पष्ट करें स्थानीय निकायमंत्री।

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सरकार का कार्य व्यपार करना नही जनहितकारी कार्य करना है।

राजस्व रिकॉर्ड में सदर छेत्र की मलकियत किसके नाम यह तथ्य भी महत्वपूर्ण।

इनैलो सरकार के समय 13 कॉलोनियां कलेक्टर रेट के 20% पर दी गयी थी।

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अम्बाला छावनी को फ्रीहोल्ड करने के नाम पर वाहवाही लूटने वालों को आड़े हाथों लेते हुए इनैलो प्रदेश प्रवक्ता ओंकार सिंह ने कहाकि फ्रीहोल्ड करने की मौजूदा नीति अस्पष्ट, अनुचित व जनता की जेब पर डाका डालने वाली है। नोटिफिकेशन जारी हुए 26 दिन हो चुके हैं अभी तक न तो किसी अधिकारी को नीति के प्रावधान स्पष्ट हो पाए हैं और न ही सरकारी पोर्टल खुला है जबकि नीति समयबद्ध है। यह तथ्य भे समझ से परे है कि कोरोना संक्रमण व आर्थिक मंदी के समय जबकि प्रत्येक व्यक्ति संसाधनों की कमी से जूझ रहा है ऐसे समय मे जनता पर आर्थिक बोझ डालना कहां तक उचित है। अम्बाला छावनी में कुल 7 प्रकार की सम्पत्तियां है:- ओल्ड ग्रांट, सामान्य लीज़, गवर्नमेंट अलॉटमेंट, स्थायी लीज,कृषि भूमि,किराए वाली और सदर छेत्र से बाहर मलकियत वाली जमीन। सदर छेत्र से बाहर की सम्पत्ति बारे कोई शंका नही है लेकिन शेष 6 प्रकार की संपत्तियों में से किस पर किस प्रकार यह नोटिफिकेश लागू होगा यह अस्पष्ट है और जहां अस्पष्टता होती है वहां ही भ्र्ष्टाचार पनपता है। ओल्ड ग्रांट सम्पत्ति वो सम्पत्ति है जो अंग्रेजो ने तत्कालीन शक्तियों का प्रयोग करते हुए सेवाओ के प्रतिफल स्वरूप ग्रांट में दे दी थी और ग्रांट व दान का स्थापित नियम है कि दिया हुए दान व ग्रांट वापिस नही ली जा सकती। ग्रांट व दान प्राप्तकर्ता मालिक वाले असीमित अधिकार स्वेच्छा से प्रयोग कर सकता है। सरकारी अलॉटमेंट में वो सम्पत्तियां आती है जो भारत सरकार ने बंटवारे के पश्चात नागरिकों को नीलामी या बोली में नीलामी राशी जमा करवाने पर अलॉट की थी ऐसी सम्पत्तियों के मालिक पहले ही भारत सरकार को इसकी कीमत अदा कर चुके हैं। शेष सम्पत्तियों में से किस सम्पत्ति पर मौजूदा नोटिफिकेशन लागू होगी यह बहुत ही अस्पष्ट है। हरियाणा सरकार अम्बाला सदर छेत्र को फ्रीहोल्ड करने की बात कर रही है पहले यह तो बताए कि राजस्व रिकॉर्ड में इस भूमि की मलकियत किसकी। नीति अनुसार सम्बन्धित छेत्र के मौजूदा कलेक्टर रेट अनुसार कुछ छूट के पश्चात सम्बन्धित व्यक्ति के नाम सरकार रजिस्ट्री करवा देगी। प्रश्न अनेक उठने स्वभाविक है। वर्णनीय है 5 फरवरी 1977 के भारत व हरियाणा सरकार के बीच हुए इकरार के अनुसार एक्साइज एरिया की 1065 एकड़ भूमि सम्बन्धी सभी अधिकार अम्बाला कैंटोनमेंट से अलग करके निशुल्क हरियाणा सरकार को हस्तांतरित किए गए थे। उक्त इकरारनामे के क्लॉज़ 4 में स्पष्ट प्रावधान है कि यदि हरियाणा सरकार उक्त भूमि को फ्रीहोल्ड करती है या उसकी किस्म परिवर्तित करती है तो ऐसा करने से होने वाली आमदन का 50% भारत सरकार को दिया जाएगा। प्रश्न यह है कि ब्रिटिश का कानूनों और नियमो के तहत किसी कानूनी अधिभोगी या अनुदानी के अधिकारों में मोजूदा सरकार परिवर्तन कैसे कर सकती है जबकि यह स्थापित नियम है कि सरकारें बदलने से किसी के व्यक्तिगत अधिकारों पर कोई प्रतिकूल असर नही पड़ता। इससे पूर्व भी वर्ष 2000 में जब हरियाणा में चौधरी ओम प्रकाश चौटाला जी के नेतृत्व वाली इनैलो सरकार ने पत्र संख्या 8/73/95-6 दिनांक 6 सितंबर 2000 द्वारा अम्बाला छावनी में सरकारी जमीन पर अवैध रूप में बसी 13 कॉलोनियों को कलेक्टर रेट से 80% की छूट पर 200 रुपये प्रतिवर्गगज के हिसाब से वहां बसे कब्जाधारियों को मालिक बन दिया था। उस समय भी अम्बाला छावनी के विधायक अनिल विज ही थे और वहां का कलेक्टर रेट 1000 रुपये प्रतिवर्गगज था। आज हरियाणा व केंद्र दोनो में भाजपा सरकार है और प्रदेश के सबसे ताकतवर मंत्री भी अनिल विज है जो हल्के को चप्पे चप्पे से जानते हैं तो फिर फ्रीहोल्ड करने के लिए कलेक्टर रेट की शर्त क्यों जबकि मुख्य स्थानों का कलेक्टर रेट व्यवसायिक 38000 रुपये और रिहायशी 12000 रुपये प्रतिवर्गगज है। जो व्यक्ति आजादी के बाद या आजादी के पहले से, 80 से 150 वर्षो से इसी भूमि पर बसे हुए हैं और उक्त भूमि अनगिनत बार बिक भी चुकी है, बिकने के समय मूल्य में भूमि का मूल्य भी साथ लग कर सरकार अनगिनत बार स्टाम्प ड्यूटी वसूल कर चुकी है तो अब अम्बाला निवासी मोजूदा रेट में कुछ छूट प्राप्त करके रजिस्ट्री क्यों करवाएगें। क्या कोई अपने पुरखों की जमीन दोबारा सरकार से ख़रीदगा। कोरोना संक्रमण व मंदी के चलते आज प्रत्येक व्यक्ति परेशान हैं ऐसे में लाखों-करोड़ो का भुगतान करना नामुनकिन व गैरवाजिब है। उदाहरण के लिए जिसकी सदर बाजार में 200 गज का शोरूम है उसकी कलेक्टर रेट अनुसार कीमत 38000×200 यानी 76 लाख रुपये बनती है इस पर अधिकतम 50% छूट भी मिल जाए तो 38 लाख बनते हैं और इतनी रकम आज की तारीख में अपनी दुकान बेच कर ही इकट्ठा कर सकता है। इस स्कीम का सबसे खतरनाक बिंदु यह भी है कि यह स्कैम सब पर लागू है पर पोर्टल खुलने के 30 दिन के अंदर यदि कोई किराएदार या लीज होल्डर पोर्टल पर निवेदन नही करता तो उसे किराएदार माना जाएगा और उसके किराए का पुनर्निधारण मोजूदा कलेक्टर रेट×दुकान का छेत्र×5% के बराबर प्रतिवर्ष होगा। हां एक बात तय है कि जो अवैध कब्जाधारी है या नगरपरिषद के किराएदार है वो इस स्कीम का लाभ जरूर उठाएंगे क्योंकि उनकी मलकियत बन जाएगी। यहां भी एक परेशानी यह है कि एक दुकान कई कई बार बिक चुकी है जबकि नगरपरिषद में हस्तांतरण नीति के अभाव में नगरपरिषद के रिकॉर्ड में असली मालिक के नाम ही खड़ी है इससे आपसी व अदालती झगड़ो में भी वृद्धि होगी। यहां यह वर्णन करना भी जरूरी है कि नगरपरिषद के 936 किराएदार है जिनसे प्रतिमाह 17,70,447 रुपए किराया प्राप्त होता है जिससे नगरपरिषद कर्मचारियों का वेतन दिया जा सकता है जो सरकार द्वारा उन्हें स्थान बेचने से बन्द हो जाएगा। यह सरकार तो उक्त दुकानों को बेचकर 25 से 30 करोड़ रुपये वसूल लेगी लेकि आने वाले समय मे अगली सरकारों के लिए मासिक आमदन बन्द हो जाएगी। उक्त सभी तथ्यों को देखते हुए हमारी सरकार से मांग है कि उक्त नीति को समयबद्ध व सभी पर आवश्यक रूप से लागू न किया जाए। जो व्यक्ति वैध तरीके से, ओल्ड ग्रांट से या भारत सरकार से नीलामी में खरीदकर मालिक बने हुए हैं उन्हें उनकी सम्पत्ति बिना कलेक्टर रेट के मामूली हस्तांतरण शुल्क लेकर उनके नाम कर देनी चाहिए। हम सरकार की पॉलिसी का विरोध नही करते लेकिन इसके प्रावधान जनविरोधी है जिन्हें जनहित में बदलना जरूरी है। सरकार यदि इसमे आवश्यक संशोधन नही करेगी तो जनहित याचिका डाल कर जनता को राहत दिलाई जाएगी।

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