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मुंबई में रहने वाले दलित उपन्यासकार रामनारायण पासी जातिवाद का शिकार!

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मुंबई में रहने वाले दलित उपन्यासकार रामनारायण पासी जातिवाद का शिकार!

रिपोर्ट : के . रवि ( दादा ) ,,

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सालो पहले एक समय था जब मनोरंजन का मुख्य साधन उपन्यास था. वेद प्रकाश शर्मा और सुरेंद्र मोहन पाठक जैसे कई उपन्यास लेखक उस समय एक स्टार थे. इन्हीं में से एक थे विनय प्रभाकर. विनय प्रभाकर द्वारा लिखे उपन्यास की काफ़ी माँग थी, बहुत से लोग उन्हें पढ़ा करते थे. पर विनय प्रभाकर के पाठकों को यह नहीं पता था की विनय प्रभाकर सिर्फ़ एक ट्रेड नाम है और विनय प्रभाकर के नाम से अधिकतर उपन्यास रामनारायण पासी ने लिखे थे. विनय प्रभाकर की मेजर नाना पाटेकर सिरीज के तो सारे उपन्यास रामनारायण पासी ने ही लिखे थे.रामनारायण की पढ़ाई लिखाई मुंबई में हुई ,उनके पिता मुंबई की मिल में काम करते थे . पढ़ाई के दौरान ही उपन्यास पढ़ने की आदत लग गई थी.

मुंबई के टेलीफोन नगर निगम में उन्हें भी 1979 में मज़दूर के तौर पर नौकरी लग गई थी . पर उसमें इतनी कमाई नहीं थी की परिवार के साथ अच्छे से गुजर बसर की जाय. तभी अचानक उनके दिमाग़ में आया की क्यों ना उपन्यास लिखा जाय . उस समय उपन्यास की बहुत माँग थी उपन्यास किसी स्टार से कम नहीं होते थे और पैसे भी काफ़ी मिलेंगे.
यही सोच कर उन्होंने लिखना शुरू किया. पहला उपन्यास लिखकर जब रामनारायन प्रकाशकों के पास पहुँचे तो हक़ीक़त से सामना हुआ. किताब अच्छी लिखी थी इसलिए छापने के लिए तो सब तैयार थे पर या तो अपने नाम पर या किसी और ट्रेड नाम पर . कोई भी प्रकाशक उनके नाम से किताब छापने को तैयार ना हुआ.

कुछ प्रकाशकों ने आश्वासन दिया की कुछ किताब हमारे लिए लिखिए, बाद में सोचेंगे आपके नाम से छापने के लिए. इसी आश्वासन पर कई उपन्यास लिखे विनय प्रभाकर और कुछ उपन्यास अर्जुन पंडित और दूसरों के नाम से भी लिखे थे
थ्रिलर और सस्पेंस के साथ साथ प्रकाशक जो भी विषय कहते हर उस सब्जेक्ट पर लिखने में महारत हासिल थी रामनारायण जी को.
उन्होंने काफ़ी प्रयास किया की कुछ उपन्यास उनके नाम से भी छपे, इसलिए प्रकाशकों ने जो कहा वह लिखते गए पर प्रकाशकों ने सिर्फ़ आश्वासन दिया. कई पत्र पत्रिकाओं में भी उस समय लिखते रहते थे . मुंबई में थे तो फ़िल्मों और टी वी मालिकाओ के लिए भी उन्होंने प्रयास किया. कई साल फ़िल्म राइटर असोसियशन के मेंबर भी थे. पर हमारे समाज के लोग बहुत स्वाभिमानी होते है चाहे जो हो जाय किसी के सामने झुकेंगे नहीं . स्वाभिमान से समझौता नहीं करेंगे . और फ़िल्मी दुनिया में तो जगज़ाहिर है , की अपने स्वाभिमान को साथ लेकर आगे नहीं बढ़ सकते और अगर आप दलित समाज से है तो फिर तो कहाँ की बात . रामनारायण पासी को किसी के सामने झुकना , चापलूसी करना,जी हजुरी पसंद नहीं था नतीजा वहाँ भी धोखा मिला. कोई सहायता करने वाला भी नहीं था. इसलिए उन्होंने लिखना ही छोड़ दिया .
रामनारायण जी का जन्म 1959 में हुआ था . वह तीन भाई और एक बहन है. रामनारायण जी के दो बेटे और एक बेटी है . बेटी पंजाब में , बड़ा बेटा बेंगलोर में और छोटा बेटा मुंबई में परिवार के साथ सेटल है . रामनारायण जी ने 30 साल में नौकरी करने के बाद साल 2019 मे रिटायर हुए है और अब मुंबई से जाकर वह अपने गाँव प्रतापगढ़ , सांगीपुर में खेती में कुछ रिसर्च कर रहे है .
वैसे वह हमेशा ही कुछ नया सीखने में व्यस्त रहते है. रिटायर होने के कुछ साल पहले कम्प्यूटर और लैप्टॉप चलाने में भी दक्षता हासिल कर ली हैं . अभी कुछ महीना पहले कार ड्राइविंग करना भी सीख लिया है वह भी बिना ड्राइविंग क्लास गए .

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