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Thursday, June 24, 2021
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कुछ चिकित्सक गुनाहगार हो सकते है पर चिकित्सा विज्ञान नही- पंडित केशव कृपाल

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कुछ चिकित्सक गुनाहगार हो सकते है पर चिकित्सा विज्ञान नही- पंडित केशव कृपाल

बाबा रामदेव ने इस त्रासदी के समय अनावश्यक दुर्भाव का बीज बो दिया…

भदोही। आयुर्वेद और एलोपैथी को लेकर चल रहे द्वंद देश में चर्चा का विषय बना हुआ है और अपने अपने हिसाब से अपना पक्ष रख रहे है। इसका नजारा सोशल मीडिया खासकर फेसबुक पर खुब दिख रहा है। इस विषय पर भदोही जिले के प्रकांड विद्वान और वरिष्ठ पत्रकार पंडित केशव कृपाल महराज ने अपनी राय फेसबुक पर शेयर की और चिकित्सा जगत को राजनीतिक अड्डा बनाने पर चिंता व्यक्त की।
पंडित केशव कृपाल महराज ने कहा कि हिन्दू- मुस्लिम, ऊंच-नीच, गाँधी-गोडसे, नेहरू-सुभाष, ये पार्टी वो पार्टी करके लोगों के आपस में लड़ने की रिवायत अब चिकित्सा पद्धति पर भी मेहरबान हो गई है। कहा कि सारी पद्धतियों के मूल में प्राकृतिक वनस्पतियाँ हैं और सारे अविष्कार जीवों पर परमात्मा के अनुग्रह के फल हैं। युग परिवर्तन और नित्य नए रिसर्च के अनुसार एलोपैथी विश्व में आपात चिकित्सा का एकमात्र विकल्प है। सामान्य स्थितियों में आयुर्वेद, यूनानी और होम्योपैथी का सतत उपयोग हो रहा है और लोग लाभान्वित भी हो रहे हैं।आयुर्वेद के आधुनिक पाठ्यक्रम में एलोपैथी सम्मिलित है और तदनुसार उपचार में भी प्रयुक्त हो रही है। दूसरी ओर हजारों आयुर्वेदिक कॉम्बीनेशन की दवाएं एमडी और एमएस डॉक्टर साधारण से लेकर स्नायु के उपचार में खुशी-खुशी मरीजों को लिख रहे हैं। इतना ही नहीं कई प्रकार के योग करने की भी बराबर सलाह देते हैं। इसमें तनिक भेदभाव न था, न है। अब झगड़ा बढ़ा है व्यापारी बाबा के निरंकुश बयानों से। फिर क्या? पद्धतियों में जंग छिड़ गई। डॉक्टर जूझने लगे। दवाइयाँ लड़ने लगीं। इंजेक्शन तन गए। इधर एक अरसे से सुस्त बैठे मीडिया के सेनानी दूध-हल्दी, काढ़ा, च्यवनप्राश जो भी था लेकर आमुख पटल (फेसबुक) आदि पर बादलों की तरह घिर आये। लोग डॉक्टरों की लूट-खसोट, संवेदनहीनता और अन्य दुर्गुणों को धो-पोछ कर इसी वक्त पेश करने लग गए। कुछ चिकित्सक दोषी होंगे और हैं भी, लेकिन चिकित्सा विज्ञान गुनाहगार नहीं है। जब राजनेता उँगली उठाकर टीवी पर संदेश प्रसारित कर रहे होते हैं, उसी समय किट और दस्ताने पहन कर डॉक्टरों की दशों उंगलियाँ एक मानव की ज़िंदगी और मौत का फैसला लिखने में तल्लीन रहती हैं। किसी अपवाद को समग्रता में व्यक्त करना बुद्धि की विकलता कही जाएगी। इसीतरह पुलिस है। इसमें हजार कमियाँ बेशक हैं। लेकिन चुनौतियों के सामने कुर्बानी देने के समय उसकी जगह हम और आप नहीं जाएंगे। अपनी खास तकरीर के लिए राष्ट्रीय विदूषक की मान्यता प्राप्त कर चुके बाबा रामदेव ने इस त्रासदी के समय अनावश्यक दुर्भाव का बीज बो दिया। अपने साथ ही हमारी महान आयुर्वेदिक धरोहर को भी विवादों में लेकर कूद पड़े। परोक्ष रूप से इनका एक नुस्खा जरूर कामयाब सिद्ध हुआ। लाखों लोगों की दर्दनाक मौत, अस्पताल, बेड और ऑक्सिजन का अकाल, लकड़ी, कफन और श्मसान का मयस्सर न होना, सारा मुद्दा भूल सा गया। याद रह गई बाबा और डॉक्टरों की लड़ाई। यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण रहा। तत्काल इसपर विराम की आशा की जानी चाहिए। सभी पद्धतियों का यथास्थान अपना महत्व है। आयुर्वेद समर्थकों को एलोपैथी की धज्जियाँ उड़ाते हुए यह भी समझना होगा कि जिसके पैर की हड्डियाँ छह जगह से टूटी हों, उसे उत्तानपादासन नहीं कराया जा सकता और न ही रस-भस्मादि का सेवन कराकर उन्हें जोड़ा ही जा सकता है।

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