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प्रोजेक्ट मुंबई की ओर से एन.यू.जे. महाराष्ट्र के जरूरतमंद मीडिया कर्मियों की मदद!

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रिपोर्ट : के . रवि ( दादा ) ,

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मुंबई : कोरोना संकट ने समाचार पत्र व्यवसाय के साथ-साथ अन्य उद्योगों में भी संकट पैदा कर दिया . हजारों नौकरियां चली गईं! वेतन काट दिया गया, साथ ही स्वतंत्र पत्रकार, फोटोग्राफर, उनके अपने दैनिक समाचार पत्र, यहां तक कि साप्ताहिक न्यूज़पेपर वालों के लिए भी अब के कठिन दिन है , महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने भी चौथे स्तंभ की मदद करने का बयान दिया हैं .
एनयूजे महाराष्ट्र की ओर से मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे, उपमुख्यमंत्री अजीत पवार, विधान परिषद के उपाध्यक्ष डॉ. नीलमताई गोर्‍हे, श्रम मंत्री हसन मुश्रीफ, स्वास्थ्य मंत्री राजेश टोपे, स्वास्थ्य राज्य मंत्री डॉ. राजेंद्र पाटिल येड्रावकर और कई अन्य संबंधित मंत्रीयो को संकट में फंसे फ्रंटलाइन वर्कर्स को अरथात सभी मीडियाकर्मियों की मदद के लिए निवेदन दिये गए .

लेकिन सरकार के पास 3,000 मान्यता प्राप्त पत्रकारों के बिना पूरा डेटा नहीं है . इस समस्या के कारण, महाराष्ट्र में वास्तव में जरूरतमंद मीडियाकर्मी सरकारी मदद से वंचित हो गए हैं, एनयूजे की महाराष्ट्र अध्यक्ष शीतल करदेकर ने कहा की,कोरोना से जान गंवाने वाले मीडियाकर्मियों के परिवारों को महाराष्ट्र सरकार से नहीं मिली कोई मदद!
इस पृष्ठभूमि के खिलाफ, प्रोजेक्ट मुंबई के संस्थापक और सीईओ शिशिर जोशी, जो सार्वजनिक सेवा में अथक प्रयास कर रहे हैं, एनयूजे महाराष्ट्र के बयान पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी और मुंबई और उपनगरों में जरूरतमंद मीडिया कर्मियों के लिए आवश्यक वस्तुओं का एक सेट दान किया .
इसे एनयूजेमहाराष्ट्र के दादर कार्यालय में वितरित किया जा रहा है . कोषाध्यक्ष वैशाली अहेर ने एनयूजे महाराष्ट्र के संस्थापक, संरक्षक शिवेंद्र कुमार और अध्यक्ष शीतल करदेकर के साथ प्रोजेक्ट मुंबई के शिशिर जोशी को उनकी मदद के लिए धन्यवाद दिया हैं.
केंद्रीय सचिव कैलास उदमले ने कहा कि एनयूजे महाराष्ट्र बेलगाम सहित राज्य भर में जनसेवा और मीडिया क्षेत्र की जरूरतों को विभिन्न तरीकों से पूरा कर रहा है .
महासचिव सीमा भोईर ने कहा कि हम हमेशा प्रोजेक्ट मुंबई जैसे समाज कल्याण के लिए काम करने वाले संगठन के साथ रहेगे .
गौरतलब हो की महाराष्ट्र में मीडिया कर्मियों को शेकडो यूनियन है , पर इनमेंसे उंगली पर गिनी जा सकती उतनी ही बहुत कम यूनियेने मीडिया कर्मियों की मदत कर चुके है और कर भी रहे है . पर दुर्भाग्य है कि जो मीडिया कर्मी बड़े बड़े बैनर के साथ काम कर रहे है जिनको हम अक्सर टी व्ही के जरिए देखते रहते हैं , उन्हें बाकी मीडिया कर्मियों का दुःख बाटने तक की समझ नहीं आती ,और यदि आती भी हो तो वे जरूरतमंद मीडिया कर्मियों की मदत को लेकर अपना मूंह मोड़ चुके नजर आते है ?
यह बड़ी दुर्भाग्य पूर्ण बात है .

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