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शरणागत

शरणागत

मैं दीनहीन दुखीयार हूं
मुझे अपनी शरण में प्रभु रख लो न।
मैं जन्म-जन्म का मारा हूं
मुझे अपनी शरण में प्रभु रख लो न।
मैं हर जगह से हारा हूं
मुझे अपनी शरण में प्रभु रख लो न।
रोग शोक ने मुझे घेरा है
मुझे अपनी शरण में प्रभु रख लो न।
मैं अज्ञान अंधकार में डूब रहा
मुझे अपनी शरण में प्रभु रख लो न।
मैं चेतन से जड़ बन रहा
मुझे अपनी शरण में प्रभु रख लो न।
मैं हर दिन पाप कर्म कर रहा
मुझे अपनी शरण में प्रभु रख लो न।
मैं तेरी खोज में हर पल भटक रहा
मुझे अपनी शरण में प्रभु रख लो न।
मैं तेरे प्रेम स्नेह के लिए तरस रहा
मुझे अपनी शरण में प्रभु रख लो न।

राजीव डोगरा
(भाषा अध्यापक)
गवर्नमेंट हाई स्कूल ठाकुरद्वारा
पता-गांव जनयानकड़
पिन कोड –176038
कांगड़ा हिमाचल प्रदेश
9876777233
rajivdogra1@gmail.com

मौलिकता प्रमाण पत्र
मेरे द्वारा भेजी रचना मौलिक तथा स्वयं रचित जो कहीं से भी कॉपी पेस्ट नहीं है।

 

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