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अच्छी प्रजातियों का चयन एवं उन्नत खेती से बढ़ सकती है अरहर की पैदावार

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अरहर देवरिया जनपद के पहचान हुआ करते थे मगर आज किसानों के अरहर बुवाई में कम रुचि होने के कारण तथा घड़रोज जैसे जानवरों के प्रकोप के कारण जनपद में अरहर का रकबा लगातार कम होता जा रहा है जबकि अरहर की फसलें कम लागत में अच्छा मुनाफा देती हैं। अरहर की खेती के प्रति किसानों को जागरूक होना होगा और जानवरों आदि से बचाव के लिए अरहर के क्षेत्रफल को बढ़ाना होगा। अरहर की फसल उगाने से मृदा की उर्ववरा शक्ति में वृद्धि होती है इसकी की जड़ों में उपस्थित रेजोबियम जीवाणु वातावरण से मृदा में नत्रजन का स्थिरीकरण करते हैं एवं पत्तियां झड़ कर मिट्टी में मिल जाती हैं खाद का काम करती हैं।

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Selection of good species and improved cultivation can increase the yield of tur

अरहर की खेती पर चर्चा करते हुए कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी एवम वैज्ञानिक रजनीश श्रीवास्तव ने बताया कि अरहर की खेती में अच्छी प्रजातियों का चयन एवं उन्नत तरीके से उगाने से ना केवल पैदावार बढ़ेगी बल्कि अच्छी गुणवत्ता वाले होते हैं। कम दिन में अरहर की पैदावार लेने के लिए 125 से 140 दिन में पकने वाली प्रजातियां जैसे उपास 120 पूसा 992 पूसा 2000 एक पूजा 2002 का चयन करना चाहिए वहीं 210 से 250 दिनों मैं तैयार होने वाली प्रजातियों में मालवीय चमत्कार, नरेंद्र आरहर एक नरेंद्र आरहर 2 राजेंद् अरहर1 का चयन करना चाहिए। बुवाई करते समय ध्यान रखना चाहिए की कम दिन वाली फसल को जून के प्रथम से द्वितीय सप्ताह तक अवश्य दें तथा लंबी अवधि वाली किस्मों की बुवाई मानसून आने के साथ जुलाई के प्रथम पखवाड़े तक अवश्य कर दें।

Selection of good species and improved cultivation can increase the yield of tur
अरहर की बुवाई मेंड बनाकर करने से अच्छा उत्पादन होता है। अरहर को लाइन से ही बोए। अरहर के साथ मक्का हल्दी उड़द मूंग आज की अंतर फसल भी ली जा सकती है। अंता फसल के लिए एक लाइन और हर एक लाइन मक्का , हल्दी, बाजरा या मूंग लगाएं। लाइन की दूरी 45 से 60 सेंटीमीटर तथा पौधे से पौधे की दूरी 15 से 25 सेंटीमीटर रखी जानी चाहिए। वैसे तो अरहर में ज्यादा खाद की आवश्यकता नहीं होती परंतु अच्छी उपज के लिए प्रति हेक्टेयर 8 से 10 टन गोबर की खाद मिलाकर खेत की अच्छी तरह से जुताई कर देना चाहिए। रसायनिक उर्वरकों के लिए 20 से 25 किलोग्राम नाइट्रोजन 60 से 80 किलोग्राम फास्फोरस तथा 40 किलोग्राम पोटाश उपयोग करना चाहिए साथ में 25 किलोग्राम सल्फर भी प्रयोग करना चाहिए।
उक्त बीमारी से बचने के लिए बीज की बुवाई करते समय 8 से 10 किलोग्राम ट्राइकोडरमा प्रति किलोग्राम बीज की दर से उच्चारित करना चाहिए। प्रयोगों में यह पाया गया है कि अरहर में दाना बनते समय यदि बरसात नहीं हो तो एक सिंचाई अवश्य करनी चाहिए।

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कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी ने बताया के केंद्र पर राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के अंतर्गत दलहनी फसलों के सीड हब का कार्यक्रम चल रहा है जिसके अंतर्गत किसानों के प्रक्षेत्र पर दलहनी फसलों के बीज उत्पादित कराए जाते हैं। उत्पादित बीज को केंद्र द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य के साथ 10 से 20 प्रतिशत प्रोत्साहन राशि पर क्रय की जाएगी। जो भी किसान बीज उत्पादन कार्यक्रम से जुड़ना चाहते हैं वह कृषि विज्ञान केंद मल्हना भाटपार रानी पर संपर्क करें।

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